बागी

परतों तले छिपी आत्मशक्ति,
पानी की कुछ बूंदों से निखर,
भीतरी रंजिश भुला,
फ़ैल पड़ी थी। 

राहगीरों की नज़रों से बच,
मन की दरारों से झाँक,
अजीब से कोलाहल में पनप,
मुँह-आँखों पर लिपटी पट्टियों को फाड़ निकली थी। 

हवा का सोता छिपा था उसमें,
कायनात ने सिर्फ पैर जड़ किये थे,
न्यूटन को गुरुत्वाकर्षण की प्रेरणा दे,
पल में जड़ को चलायमान बना दिया था। 

प्रण है आत्ममंथन द्वारा,
स्व-उद्भव को शुचित कर,
बेहतर सांसारिक जीवन खड़ा करने का,
हवा-पानी को बाज़ारू बनने से रोकने का। 

खुले में गलत की निंदा,
श श की फुसफुसाहट से अटने लगी है,
अनजान डर की तरंग पानी में,
ज़मीन से आठ सौ फुट नीचे जा पहुंची है। 

चर्चा आम है,
हरियाली को दिनदहाड़े अगवा करने की,
नासमझ एक नन्हे पौधे ने विद्रोह किया,
उन्होंने उसे पॉलिथीन में चुनवा आतंकवादी करार दे दिया। 

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