आखिरी सांस।

बाहरी आग में जलना
मांस के लोथड़ों को रास आया
रोएं, खाल, आँख की पुतलियाँ
गैस के चैम्बर में अमानवता का खज़ाना सजा था .

काले धुएं में जगमगाते जिस्म
अंड्ड-योनि कोशों में लगी आग
गैस चैम्बर से भिन्न
अमानव-मानवीय मानव का निर्माण करने को आतुर थी .

आग फिर पलट कपड़ों को जलाती
मंटो की “खोल दो” बनती हुई
अंगारों के बिस्तर पर
राख की एक और परत बन जाती है .

हाथ से बुहारते हुए, संभालते हुए
वैसी ही रात को जब मैंने उसे गले लगाया
उसने ठण्डी सांस ली, कोहरा उगलते हुए

आखिरी सांस .

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