खुद को लिखती कविता।

चार दिवारी के बीच
आजकी सुहागरात कि सेज पर
कविता , खुद को लिख रही है।

कमरे में आई
जीवित सी मरी हुई
कपड़े उतारे, हो मशीन जैसे
मुस्कुराई, हो मशीन जैसे
करने लगी इंतज़ार, न जाने किसका।

उसकी आँखों में वही गहराई थी
जिसे चंदा कि आँखों में देख
लहरें उठ उठ जाती हैं।

प्रेमिका होने का
न बहिन होने का
न माँ होने का
था अधिकार उसे।

हमसफ़र न थी वो
हमबिस्तर थी सभी की
वो सब पर हंसती ज़िंदा लाश।

खूबसूरत ऐसी
जैसे माँ बच्चे के लिये
खुदा फ़कीर के लिये।

पर उसकी पहचान न आँखों से थी
न खूबसूरती भरी बातों से
उसकी पहचान उसके नाम से थी।

न जाने कब से कब तक
कितनी सदियों से उसका नाम

रण्डी !

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