पिट्ठू

नन्हे नन्हे अक्षर
पिट्ठू के पत्थर जमा रहे हैं
लगा जैसे कोई शब्द बना रहे हैं !

झील के सिरहाने
पहाड़ का सहारा लिए हुए
एक संसार अपने आप में
नन्हे मुन्नों का है ये !

चिड़ियों के फुदकने के बीच
हवा की चहचाहट
और अक्षरों का दौड़ना
शब्द बनने की प्रक्रिया में !

एक देवी जो दिन रात
अपने गर्भ में एक ही सपना पालती है
अक्षर शब्द कब बनेंगे
बनेंगे भी या नहीं !

असंख्य अक्षर तो इस प्रक्रिया को तर न सके
भूख के कारण
गरीबी के कारण
ये कारण जो सदियों से हैं अजाने
जान बूझ कर भी !

कब बनेंगे अक्षर शब्द
खुद से पूछता हूँ मैं !

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