खण्डहर

मैं अकेला सा, तन्हा सा, खण्डहर
कभी था परछाई बनाती शरीर सा घर !

घर, जिसकी चार दीवारें
माँ सी ममता
दोस्त सी आत्मीयता रखती हैं !

मेरे हर हिस्से ने
जो था या है
हर रंग देखे हैं
जो थे और हैं !

मैंने भी देखें हैं
जीवन का सृजन करती माँ के दिन
साथ में गिने हैं कई माओं के नौ महीने !

टपकती छत्त  नहीं थी वो
मैं रोया था बहुत
जब वो नव अंकुर, साकार जीवन न बन सका !

कितनी करवटें काटी हैं मैंने
उन नवविवाहित जोडों के अन्तरंग क्षणों में
और संजोये रखा उन पलों को उनकी आँखों में हमेशा !

इस श्मशान से आँगन में
गूंजी हैं असंख्य किलकारियां !
वो उस नन्ही पारी ने
माँ का खिलाया छोटा सा दाना
वापस उगल दिया था मुझपे , और थोड़े प्यार के साथ !

वो दौड़ी सोई  हंसी रोई
और देखते ही हो गयी बड़ी, कितनी खुशमिजाज ,दर्द भरी विदाइयों का मैं साक्षी !

ये एक नहीं
अनेकों के रंग हैं
…मेरा रंग है

मैं अकेला खड़ा ,तन्हा  सा, खण्डहर  घर !

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