अफ़साना

भटकता हुआ मन
उठते से कदम
आ ठहरे एक झील किनारे !

दिखा इक बया का अफ़साना
लगा रह जाऊं यहाँ
झील के मोतिहरे पानी से थोडा सा ऊपर
अनजाने पेड़ की, अपनी सी डाली पर !

दूर झील के बीच
मेरी आँखों के पास
एक पत्थर है संगमरमर सा
जिस पर पंख फैलाये हूँ मैं, उस पंछी  में !

काश आशियाना हो मेरा भी
बया के घोंसले सा
धरा, जल और आसमां के बीच !

पर मेरा तो मन है
उथला सा, छटपटाता सा, भागता इधर उधर
तो कैसे रहूँगा झील किनारे मैं

लो, मैं वापस चला !

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